लोकनायक के आंदोलन की प्रासंगिकता – लोकनायक जय प्रकाश नारायण जयंती विशेष प्रकाशन

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लोकनायक के आंदोलन की प्रासंगिकता – लोकनायक जय प्रकाश नारायण जयंती विशेष प्रकाशन 

Relevance of Loknayak’s movement – Loknayak Jai Prakash Narayan Jayanti Special Publication 

रजनीश अग्रवाल (लेखक राज्य सभा सांसद)

लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में स्वतंत्रता के बाद देश ने अपने सबसे बड़े छात्र-युवा आंदोलनों में से एक देखा। यह आंदोलन केवल तत्कालीन व्यवस्था के प्रति असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि देश के सार्वजनिक जीवन को नई दिशा देने का प्रयास भी था।  जेपी के नेतृत्व में चले इस आंदोलन की ऐतिहासिक महत्ता को समझने के लिए इसकी तीन बड़ी विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक है।

 रचनात्मक दृष्टिकोण

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन की बुनियाद केवल विरोध पर नहीं बल्कि रचनात्मक परिवर्तन की आकांक्षा पर टिकी थी। सकारात्मक भाव था। सत्याग्रह था।  व्यवस्था को नकारने का आग्रह नहीं बल्कि उसमें सुधार करने और सार्वजनिक जीवन को अधिक उत्तरदायी बनाने का विचार था। आंदोलन का उद्देश्य केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं था। वह सामाजिक और राजनीतिक जीवन में शुचिता, जवाबदेही और जनहित के मूल्यों को प्रतिष्ठित करना चाहता था। यही रचनात्मक दृष्टि उसे महज विरोध-प्रदर्शन से अलग करती थी।

लोकतंत्र 

इस आंदोलन का दूसरा बड़ा गुण उसकी लोकतांत्रिक प्रकृति थी। व्यवस्था परिवर्तन के लिए लोकतांत्रिक तरीके अपनाना और सवैधानिक संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना उसकी मूल विशेषताओं में शामिल था। आंदोलन की शक्ति जनभागीदारी, शांतिपूर्ण संघर्ष और लोकतांत्रिक चेतना में निहित थी। इस आंदोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं था। पक्का विश्वास था कि जनता की जागरूकता और संगठित जनमत के माध्यम से व्यवस्था को जवाबदेह बनाया जा सकता है। इस दृष्टि से यह आंदोलन केवल तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की प्रतिक्रिया नहीं बल्कि लोकतंत्र की मर्यादा और उसकी संस्थागत शक्ति में भरोसे की  अभिव्यक्ति था।

दलगत षड्यंत्र की राजनीति से ऊपर

इस आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में एक उसका दलगत राजनीति से ऊपर उठने का प्रयास था। इसकी प्रेरणा किसी राजनीतिक दल के तात्कालिक स्वार्थ, सत्ता प्राप्ति की रणनीति या राजनीतिक प्रपंच से नहीं उपजी थी। इसके केंद्र में युवा शक्ति की आकांक्षाएँ, सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता और सार्वजनिक जीवन में सुधार का संकल्प था। जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी और नैतिक नेतृत्व का आधार देने का प्रयास किया। यही कारण था कि यह आंदोलन किसी एक दल की राजनीतिक गतिविधि तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक-राजनीतिक चेतना का प्रतीक बना।

       लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चले छात्र आंदोलन की ये तीन विशेषताएँ आज भी प्रासंगिक हैं—रचनात्मकता, लोकतंत्र और दलगत  स्वार्थों से ऊपर उठकर जनहित के लिए काम करने का संकल्प। किसी भी आंदोलन की सार्थकता केवल इस बात से तय नहीं होती कि वह किसके विरोध में खड़ा है, बल्कि इससे तय होती है कि वह समाज को क्या सकारात्मक दिशा देता है ? परिवर्तन के लिए कौन-सा मार्ग अपनाता है और उसके पीछे कौन-सी प्रेरणा काम करती है ?

जयप्रकाश नारायण के आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत इसी कसौटी पर समझी जानी चाहिए। वह हमें याद दिलाता है कि युवा शक्ति का वास्तविक सामर्थ्य केवल असंतोष व्यक्त करने में नहीं, बल्कि रचनात्मक परिवर्तन का वाहक बनने में है; लोकतंत्र की शक्ति केवल विरोध में नहीं, बल्कि उसकी मर्यादाओं में विश्वास रखने में है; और जनांदोलन की विश्वसनीयता दलगत लाभ से नहीं, बल्कि उसके उद्देश्यों की शुचिता से निर्मित होती है। यही लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन का स्थायी संदेश है।