गौ माता की मौत पर फूटा आक्रोश: जिंदा गाय की पुकार नहीं सुनी, मृत गाय को CMO के चेंबर में रखकर गौ सेवकों का प्रदर्शन!

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Outrage erupts over the death of a cow: The call of a live cow was not heard, cow protectors stage a protest by placing a dead cow in the CMO’s chamber!

  • लाखों की गौशाला, काऊ कैचर भी खरीदा, फिर भी सड़कों पर बेसहारा गौवंश; भूखी-प्यासी गायें पॉलीथिन और गंदगी खाने को मजबूर, लंपी वायरस के खतरे के बीच नगर पालिका की व्यवस्था पर तीखे सवाल

गोहद/भिण्ड। गोहद में एक बीमार गाय की मौत के बाद नगर पालिका की कार्यप्रणाली को लेकर गौ सेवकों और समाजसेवियों का गुस्सा फूट पड़ा। जिंदा गाय की पीड़ा पर कथित तौर पर समय पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाते हुए गौ सेवक मृत गाय को लेकर नगर पालिका कार्यालय पहुंचे और उसे मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सीएमओ) के चेंबर में रखकर विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान नगर पालिका मुर्दाबाद के नारे लगाए गए। घटना ने नगर में गौवंश संरक्षण, गौशाला संचालन और नगर पालिका की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जिंदा गाय की पुकार अनसुनी, मौत के बाद नगर पालिका में पहुंची गौ माता
गौ सेवकों के अनुसार, बीमार गाय पिछले दो-तीन दिनों से गड्ढे में फंसी हुई थी और उसकी हालत लगातार बिगड़ रही थी। नगर पालिका तथा संबंधित अधिकारियों को सूचना दिए जाने के बावजूद समय पर प्रभावी मदद नहीं मिलने का आरोप है। इसके बाद गौ सेवकों ने स्वयं मौके पर पहुंचकर गाय को गड्ढे से बाहर निकाला, उसकी सेवा की और आसपास की सफाई की।
आरोप है कि इसके बावजूद अगले दो दिनों तक गाय की स्थिति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया और आखिरकार उसने दम तोड़ दिया। इसके बाद गौ सेवक मृत गाय को नगर पालिका कार्यालय लेकर पहुंचे और सीएमओ के चेंबर में रखकर विरोध जताया। गौ सेवकों का सवाल है कि जब जिंदा गाय की जान बचाने के लिए बार-बार सूचना दी जा रही थी, तो नगर पालिका की ओर से समय पर सहायता क्यों नहीं पहुंची?

लाखों रुपये की गौशाला, काऊ कैचर की खरीदारी… फिर सड़क पर क्यों भटक रहा गौवंश?
नगर पालिका द्वारा लाखों रुपये की लागत से गौशाला का निर्माण कराया गया है। इसके अलावा सड़कों पर घूमने वाले गौवंश को पकड़कर गौशाला तक पहुंचाने के उद्देश्य से काऊ कैचर भी खरीदे जाने की बात सामने आई है। लेकिन गौ सेवकों और समाजसेवियों का आरोप है कि इन संसाधनों के बावजूद सड़कों पर घूमने वाली गायों को गौशाला तक पहुंचाने की कोई प्रभावी नियमित व्यवस्था नहीं की गई है।
यह स्थिति नगर पालिका की योजना और उसके वास्तविक क्रियान्वयन के बीच अंतर को लेकर सवाल खड़े करती है। यदि गौशाला का निर्माण और काऊ कैचर की खरीद गौवंश संरक्षण के लिए की गई है, तो फिर सड़कों पर बेसहारा गायों की संख्या और उनकी दुर्दशा पर प्रशासन को जवाब देना चाहिए।
यदि शिकायत प्राप्त होने के बावजूद समयबद्ध कार्रवाई नहीं हुई, तो यह नगर पालिका की शिकायत निवारण व्यवस्था की कार्यक्षमता पर सवाल उठाता है। प्रशासन को यह बताना चाहिए कि शिकायत कब मिली, किस अधिकारी को जिम्मेदारी दी गई और उसके बाद क्या कार्रवाई की गई।

शिकायत दी गई, व्यवस्था सुधारने की मांग उठी, लेकिन नतीजा वही—ढाक के तीन पात!
मौत के बाद जांच की चर्चा, लेकिन जिंदगी बचाने की व्यवस्था कब?
गौ सेवकों का आक्रोश केवल एक गाय की मौत को लेकर नहीं है, बल्कि उनके अनुसार यह घटना उस व्यवस्था की ओर संकेत करती है जिसमें समय पर सहायता उपलब्ध कराने के बजाय घटना के बाद प्रतिक्रिया दिखाई देती है।
यदि किसी बीमार या घायल पशु की सूचना मिलती है, तो उसके उपचार और सुरक्षित स्थान तक पहुंचाने की जिम्मेदारी के लिए स्पष्ट प्रक्रिया होनी चाहिए। नगर पालिका, पशु चिकित्सा विभाग और गौशाला प्रबंधन के बीच समन्वय नहीं होने पर ऐसी समस्याएं बनी रह सकती हैं।
नगर पालिका प्रशासन को अब यह स्पष्ट करना होगा कि बेसहारा गायों की सुरक्षा, उपचार, भोजन-पानी और गौशाला तक पहुंचाने के लिए क्या ठोस व्यवस्था मौजूद है। साथ ही, मृत गाय के मामले में लगाए गए आरोपों की जांच कर वास्तविक स्थिति सामने लाना भी जरूरी है।
गौ सेवा केवल निर्माण और खरीदारी का विषय नहीं, बल्कि नियमित देखभाल और जिम्मेदारी का दायित्व है। यदि जिंदा गौ माता को बचाने के लिए भी समाजसेवियों को स्वयं व्यवस्था संभालनी पड़े और उसकी मौत के बाद नगर पालिका कार्यालय में विरोध करना पड़े, तो यह प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय अवश्य है।